Tuesday, November 22, 2011

आँखों से रस घोलें हैं हमरे कान्हा......


9 comments:

  1. बहुत खूब... वाह

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  2. प्रेम की अभिव्यक्त्ति इससे सुन्दर हो नहीं सकती..
    बहुत खूब अमितेष भाई

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  3. वाह ………तभी तो सांवरे सलोने है हमरे कान्हा।

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  4. अच्‍छी गजल है, बधाई ।

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  5. प्रिय बंधुवर अमि'अज़ीम'अमितेष जी
    सस्नेहाभिवादन !

    आज पहली बार आपका ख़ूबसूरत ब्लॉग देखा … बहुत अच्छा लगा …प्यारी रचना है-
    अपनी छत पर तारों से बतियाते हैं
    हमरे संग न डोले हैं हमरे कान्हा


    अभी आपकी पिछली पोस्ट्स भी पढ़ूंगा … :)

    बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  6. hamesha hi to aisa hi karte hain
    jane kyon karte hai hamre kaanha...

    behad khoobsoorat bhaav liye hue hai aapki rachna

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